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International Journal of Social Science Research (IJSSR)

International Journal of Social Science Research (IJSSR)

An Open-Access, Peer-Reviewed & Refereed Bimonthly Journal

ISSN: 3048-9490

Call For Papers - Volume 3, Issue 5 (September - October 2026)
Paper Title

आधुनिक सामूहिक सुव्यवस्था में भगवद् गीता का आत्मिक संदेश और दृश्य- कला की भूमिका

Author(s)Bhavana Mishra, Dr. Mahesh Singh.
CountryIndia
Abstract

यह लेख आधुनिक समय की सामाजिक और नैतिक चुनौतियों के संदर्भ में भगवद् गीता के सिद्धांतों की प्रासंगिकता को सरल रूप में समझती है। गीता में दिए गए तीन प्रमुख योग - कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आधुनिक समाज में नैतिक नेतृत्व, संगठनात्मक संतुलन और सामाजिक सद्भाव बढ़ाने के तरीके बताते हैं। यह अध्ययन बताता है कि गीता का मुख्य विचार, निष्काम, कर्म यानी परिणामो की इच्छा के बिना काम करना, आत्मिक मुक्ति का मार्ग नहीं है बल्कि सामूहिक कल्याण का आधार भी है। गीता का यह विचार आज की व्यस्त और प्रतिस्पर्धा समाज में संतुलन की ओर व्यक्ति और समाज दोनों को प्रेरित करता है। लोकसंग्रह, या सामूहिक सुव्यवस्था में योगदान निस्वार्थ भाव से किया जाता है। यह विश्लेषण बताता है कि गीता का मुख्य सिद्धांत, निष्काम कर्म, केवल व्यक्तिगत मोक्ष का मार्ग नहीं है। यह सक्रिय रूप से लोकसंग्रह के लिए एक स्थायी नैतिक नेतृत्व मॉडल भी बनाता है, जो आधुनिक कार्यस्थलों में तनाव और विश्वास संकटों को संबोधित करता है। इस शोध पत्र में यह भी कहा गया है कि दृश्य कला, जैसे चित्रकला और प्रदर्शन कलाएं इस आत्मिक संदेश को आम लोगों तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है। भारतीय सौंदर्यशास्त्र के अनुसार, कला में रस (भावात्मक रसास्वादन) और साधारणीकरण की प्रक्रियाओं के माध्यम से व्यक्ति की चेतना सामूहिक चेतना से जुड़ती है। कला, समाज के अंदरूनी भावों को उजागर करती है और नैतिक मूल्यों को व्यवहार में बदलती है। गीता के दर्शन और दृश्य-कलाएँ मिलकर आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करते हैं, साथ ही मानसिक संतुलन और सामाजिक एकता को भी सशक्त बनाते हैं। सामाजिकीकरण के माध्यम से नए सामाजिक-मनोवैज्ञानिक संबंधों का निर्माण होता है, जो व्यक्तिगत अनुभवों को सामूहिक अनुभवों में बदल देता है। पश्चिमी मनोविज्ञान का “सामूहिक अचेतन” सिद्धांत कहता है कि कला और मिथक समाज के गहरे छिपे मूल्यों और आदर्शों को सक्रिय करते हैं, जिससे व्यक्ति के संस्कार और व्यवहार में नैतिकता स्वतः पैदा होती है। ऐसे में दृश्य-कलाएँ समूह की चेतना को गहराई से प्रभावित करती हैं, और सामाजिक व्यवहार, भावनाओं और समूह की पहचान को बदलती हैं। इस प्रकार, गीता का दर्शन और दृश्य-कलाएँ दोनों मिलकर समाज के विभिन्न वर्गों, संस्थाओं और कार्यस्थलों में मनोवैज्ञानिक स्थिरता और एकता की प्रक्रिया को भी उत्प्रेरित करती हैं, जो एक सुव्यवस्था का नैतिक ढाँचा बनता है। इन सिद्धांतों को सामूहिक भावनात्मक उपचार के साधन के रूप में देखा जा सकता है, जिससे आधुनिक लोगों को तनावमुक्त जीवन, नैतिक नेतृत्व और बेहतर सामाजिक वातावरण मिलता है। मुख्य शब्द - आधुनिक विश्व, नैतिक शून्यता, श्रीमद्भगवद्गीता, निष्काम कर्म, समाज कल्याण, स्थितप्रज्ञ (Stable Intellect)।

Subject AreaFine Arts
Issue Volume 2, Issue 6 (November - December 2025)
Published2025/11/29
How to Cite Mishra, B., & Singh, M. (2025). आधुनिक सामूहिक सुव्यवस्था में भगवद् गीता का आत्मिक संदेश और दृश्य- कला की भूमिका. International Journal of Social Science Research (IJSSR), 2(6), 287–301. https://doi.org/10.70558/ijssr.2025.v2.i6.30713
DOI 10.70558/IJSSR.2025.v2.i6.30713
License
Copyright © 2025 The Author(s). This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License (CC BY 4.0).

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